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गंगा नदी - गंगा नदी संरक्षण का दससूत्रीय कार्यक्रम

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  • December-20-2019

हिमालय तीन प्रमुख भारतीय नदियों का स्रोत है, यानि सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र. लगभग 2,525 किलोमीटर (किमी) तक बहने वाली गंगा भारत की सबसे लंबी नदी है, जिसका बेसिन देश की भूमि का 26 प्रतिशत हिस्सा है और भारत की 43 प्रतिशत आबादी का पालन पोषण करता है.

भारत सरकार ने केंद्रीय जल मंत्रालय (जिसे पहले जल संसाधन मंत्रालय, नदी विकास और गंगा कायाकल्प कहा जाता है) के तहत राष्ट्रीय मिशन फॉर क्लीन गंगा (NMCG) के रूप में अधिकारियों की एक समर्पित टीम को मिलाकर एक सशक्त संस्था की स्थापना की है.

एनएमसीजी ने चार पुनर्स्थापना स्तंभों, अविरल धारा (निरंतर प्रवाह), निर्मल धारा (स्वच्छ जल), भूगर्भिक इकाई (भूवैज्ञानिक विशेषताओं का संरक्षण) और पारिस्थितिक इकाई (जलीय जैव विविधता का संरक्षण) के संदर्भ में अपना दृष्टिकोण सुझाया है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के 2014 के अनुमानों के अनुसार, गंगा के बेसिन में आने वाले शहरों से प्रति दिन लगभग 8,250 मिलियन लीटर (MLD) अपशिष्ट जल निकलता है, जबकि इसमें से केवल 3,500 MLD संशोधन के लिए ही सुविधा उपलब्ध है और इस तरह तकरीबन 2,550 MLD सीवरेज वाटर का प्रवाह सीधे गंगा में ही कर दिया जाता है.

नमामि गंगे के अंतर्गत 114 परियोजनाएँ पूरी हो चुकी हैं और लगभग 150 परियोजनाओं पर काम जारी है, जबकि लगभग 40 परियोजनाएँ चल रही हैं, जिनमें से 51 सीवेज परियोजनाओं को 13 मई, 2015 से पहले मंजूरी दी गई थी - जिस दिन नमामि गंगे को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित किया गया था.

अप्रैल 2019 तक, 1,930 एमएलडी की क्षमता वाले 97 सीवर ट्रीटमेंट प्लांट गंगा किनारे के शहरों में विकसित किए गए हैं, जबकि इन शहरों में सीवरेज उत्पादन 2,953 एमएलडी है. आगे यह अनुमान लगाया गया है कि सीवरेज का उत्पादन 2035 तक 3,700 MLD तक पहुंच जायेगा.

औद्योगिक प्रदूषक बड़े पैमाने पर कानपुर में टेनरियों, पेपर मिल्स, डिस्टिलरी और चीनी मिलों से यमुना, रामगंगा, हिंडन और काली नदी के कैचमेंट से निकलते हैं, फिर, नगरपालिका सीवेज का भार भी गंगा पर पड़ता है जो कुल प्रदूषण भार का दो-तिहाई है.

नवंबर 2019 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने उत्तर प्रदेश (यूपी) सरकार पर कानपुर में रनिया और राखी मंडी के अंतर्गत गंगा में जहरीले क्रोमियम युक्त सीवेज डिस्चार्ज की जांच करने में विफल रहने के लिए जुर्माना लगाया था. साथ ही एनजीटी ने प्रदूषण फैलाने के लिए 22 टेनरियों पर 280 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया.

नुकसान की लागत का आकलन राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) द्वारा क्षेत्र में पर्यावरण की बहाली और सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुआवजे के रूप में किया गया था. संयोग से, NGT ने भी UPPCB को उत्तरदायी ठहराया और गंगा में सीधे जहरीले क्रोमियम युक्त सीवेज और अन्य अपशिष्टों के अवैध निर्वहन की अनदेखी के लिए एक करोड़ रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया.

एनजीटी ने 6 दिसंबर, 2019 को अपने आदेश में स्थानीय निकायों और संबंधित विभागों को 31 मार्च, 2020 तक देश भर में नदियों में सीवेज के शत-प्रतिशत सीवेज ट्रीटमेंट को सुनिश्चित करने का निर्देश दिया. गैर-अनुपालन के मामले में, एनजीटी ने अधिकारियों को चेतावनी दी है कि वे गंगा में गिरने वाले हर नाले के लिए प्रति माह पांच लाख रुपये और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की दोषपूर्ण स्थापना के लिए पांच लाख रुपये का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होंगे.

भारत में पानी एक राज्य विषय है और जल प्रबंधन वास्तव में ज्ञान-आधारित अभ्यास नहीं है. गंगा के प्रबंधन में बेसिन-व्यापक एकीकरण का अभाव था और विभिन्न तटीय राज्यों के बीच बहुत सामंजस्य नहीं है. इसके अलावा, जल जीवन मिशन के तहत 2024 तक निर्दिष्ट स्मार्ट शहरों में जल आपूर्ति और अपशिष्ट जल उपचार के बुनियादी ढांचे को उन्नत करना और सभी घरों में स्वच्छ जल आपूर्ति प्रदान करना एक बड़ी चुनौती है.

सीमित जल संसाधनों को देखते हुए यह कार्य बहुत बड़ा है. लगभग तीन दशकों तक, गंगा को साफ करने के लिए अलग-अलग रणनीतियों का प्रयास किया गया था जैसे कि गंगा एक्शन प्लान (जीएपी, चरण I और II) और राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण (NGRBA) की स्थापना, लेकिन इन सबसे कोई सराहनीय परिणाम नहीं मिला.

हाल ही में, पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में गंगा परिषद ने 14 दिसंबर, 2019 को आयोजित अपनी पहली बैठक में गंगा बेसिन के शहरों उत्तराखंड, यूपी, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में दोनों किनारों के पाँच किमी के दायरे में जैविक समूहों का उत्साहवर्धन करते हुए मैदानी क्षेत्र में स्थायी कृषि को बढ़ावा देने की योजना बनाई है.

यह एक अच्छा नीतिगत कदम है, क्योंकि पिछले एक दशक में कीटनाशकों के संचयी उपयोग को दोगुना करने के तौर तरीके बढ़े हैं और इसका अधिकतर हिस्सा नदियों में जाकर उन्हें जहरीला बना रहा है. अल्पावधि के लिए, पांच किमी का दायरा ठीक है, लेकिन सरकार को धीरे धीरे इसे बढ़ाते हुए गंगा बेसिन के अधिकतम क्षेत्र को कवर करने के लिए भी योजना बनानी चाहिए. संपूर्ण नदी के किनारे पर कृषि जैविक ही होनी चाहिए.

गंगा परिषद ने 'नदी शहरों’ की अवधारणा पर चर्चा की और गंगा व उसकी सहायक नदियों के तट पर बसे शहरों में हर घर को सीवर कनेक्शन प्रदान करने के लिए एक कार्य योजना बनाई. पीएम ने पांच गंगा राज्यों की सरकारों को गंगा की सफाई के लिए सतत आय उत्पन्न करने हेतु नदी पर धार्मिक और एडवेंचर पर्यटन को बढ़ावा देने का निर्देश दिया.

उन्होंने यह भी कहा कि नमामि गंगे से अर्थ गंगा पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए, जो आर्थिक गतिविधि के माध्यम से एक सतत विकास मॉडल तैयार करेगा.

यह स्पष्ट है कि गंगा को केवल प्रदूषण-उन्मूलन उपायों द्वारा बहाल नहीं किया जा सकता है. प्रभावी नीति-निर्माण के लिए वैज्ञानिक आधार की आवश्यकता होती है. कई रणनीतियाँ जैसे रिवर-लिंकिंग, रिवरफ्रंट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स, शौचालयों तक पहुँच, गाँवों को खुले में शौच मुक्त बनाना, ग्रामीण क्षेत्रों में पाइप की जलापूर्ति आदि को दीर्घकालिक पारिस्थितिक और स्थिरता लक्ष्यों को गंभीरता से एकीकृत करने की आवश्यकता है और इन्हें एक अल्पकालिक लोकलुभावन कदम की तरह लागू नहीं किया जा सकता है.

गंगा प्रबंधन से जुडी नीतियों को प्रौद्योगिकी और समग्र जल प्रबंधन के व्यापक पहलुओं के साथ संगत होना चाहिए. महत्वपूर्ण समय और पैसा उन उपायों पर व्यर्थ हो सकता है, जिनकी प्रभावशीलता की गंभीरता से जांच नहीं की गई है. इसलिए अब तक किए गए सभी प्रबंधन कार्यक्रमों की समीक्षा करने और पिछली विफलताओं से सीखने की तत्काल आवश्यकता है.

एक दस-सूत्रीय दिशा निर्देश को महत्वपूर्ण चरणों के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसे NMCG को अपने चार पुनर्स्थापना स्तंभों को सुदृढ़ करने के लिए अपनाना चाहिए:


1. कॉलोनी स्तर पर केवल विकेंद्रीकृत सीवेज उपचार संयंत्रों (डीएसटीपी) को बढ़ावा देना. सिंचाई के लिए अपशिष्ट जल का पुन: उपयोग और प्राकृतिक नालियों में खाली करना. सभी नए बनने जा रहे शहरों, स्मार्ट शहरों और उन लोगों के लिए, जिनके पास मास्टर प्लान नहीं हैं, डीएसटीपी के लिए भूमि का निर्धारण. 10 MLD से नीचे के dSTP's को शहरी विकास योजनाओं और रियल एस्टेट विकास के तहत प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.

2. मौजूदा और नियोजित एसटीपी को स्वतंत्र एजेंसियों (तकनीक-दक्षता-विश्वसनीयता सत्यापन) द्वारा दक्षता, विश्वसनीयता और प्रौद्योगिकी मापदंडों पर सत्यापित करने की आवश्यकता है. यह आकलन करने की अनुमति देगा कि क्या तकनीक पैसा वसूल और टिकाऊ है. कई एसटीपी अवास्तविक पूर्वानुमानों और गलत प्रौद्योगिकी चुनाव के कारण वांछित मानकों तक प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं. सीपीसीबी द्वारा 2016 में किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि कानपुर में अधिकांश एसटीपी पर्यावरण नियमों का पालन करने में विफल हैं.

3. बाढ़ और सूखे दोनों के स्थायी समाधान के रूप में स्थानीय भंडारण (तालाबों, झीलों, आर्द्रभूमि) को विकसित और पुनर्स्थापित करना. मानसून की वर्षा के दौरान प्राप्त होने वाले पानी का केवल 10 प्रतिशत ही उपयोग होता है. तालाबों, झीलों और आद्रभूमि की बहाली नदी की संरक्षण रणनीति का एक अभिन्न अंग होना चाहिए.

4. नदियों में गिरने वाले सभी प्राकृतिक नालों को वापस लाना और उन्हें बदलकर स्वस्थ जल निकायों के रूप में फिर से जीवंत करना. आज इन प्राकृतिक नालों को नगर पालिकाओं और योजना निकायों द्वारा सीवेज में परिवर्तित कर दिया गया है. आज के कई शहरी नाले एक समय में छोटी-बड़ी नदियां हुआ करती थी.

5. गंगा बेसिन में निचले क्रम की धाराओं और छोटी सहायक नदियों को बहाल करना शुरू करें. हर नदी महत्वपूर्ण है. गंगा एक्शन प्लान (चरण I और II) और नमामि गंगे का ध्यान नदी के मुहाने पर ही रहा है, जबकि नदी का पालन पोषण करने वाली सहायक नदियों की अनदेखी की गई. गंगा की आठ प्रमुख सहायक नदियाँ (यमुना, सोन, रामगंगा, गोमती, घाघरा, गंडक, कोसी और दामोदर) हैं. गंगा के मुहाने और ऊपरी यमुना बेसिन पर प्रदूषण-उन्मूलन के उपायों पर अधिकांश धनराशि खर्च की गई, जो गंगा बेसिन का सिर्फ 20 प्रतिशत है. इसके अलावा, ये आठ प्रमुख सहायक नदियाँ छोटी नदियों से जुड़ती हैं, जिनकी बहाली भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.

6. बिना सीमेंट-कंक्रीट संरचनाओं के रूप में 'नदी-गलियारों' को पहचानें, परिभाषित और संरक्षित करें - यह जान लें कि प्रकृति के हजारों वर्षों के प्रयासों के बाद नदियों का निर्माण हुआ है. टाउनशिप विकास परियोजनाओं या शहरी/स्मार्ट शहर के विकास के नाम पर नदी के विकास जैसे लोकलुभावन उपायों के माध्यम से नदी के पारिस्थितिकी तंत्र के बुनियादी ढांचे के विकास और विनाश को रोका जाना चाहिए ताकि सतह जल स्रोतों की रक्षा और संरक्षण किया जा सके.

7. गंगा की प्रत्येक सहायक नदी की संपूर्ण लंबाई और भूमि के रिकॉर्ड को सही करें. कई नदियों को कम करके आंका गया है, जो अतिक्रमण और अधिकार क्षेत्र के टकराव का कारण बनती हैं. नदी की लंबाई को मापने के लिए मौजूदा कार्यप्रणाली त्रुटिपूर्ण है और जल संसाधनों के सही मूल्यांकन और राजस्व मानचित्रों के सही मूल्यांकन के लिए लूप्ड लंबाई की पूरी मैपिंग आवश्यक है. यह सुनिश्चित करेगा कि सक्रिय बाढ़ के मैदान और नदी-गलियारे अतिक्रमणों से मुक्त हों.

8. भूजल पुनर्भरण के माध्यम से पुनर्स्थापना आधार प्रवाह. भूजल बेस फ़्लो (औसतन 40- 55 फीसदी के क्रम में बेस फ्लो) के माध्यम से पूरे गंगा बेसिन में प्रवाह के लिए महत्वपूर्ण रूप से योगदान देता है. गंगा कायाकल्प का विचार भूजल कायाकल्प से भी जुड़ा है. नदियों को बारहमासी बनाने के लिए भूजल की निकासी और पुनर्भरण की मजबूत योजना और नियमन की भी आवश्यकता है.

9. नदी के कायाकल्प की अनुमति देने के लिए गंगा मुहाने और उसकी सहायक नदियों (केवल एक स्थिर आकृति नहीं) में वांछित पारिस्थितिक प्रवाह व्यवस्था को परिभाषित करें. अधिक आबंटन से प्रवाह घट जाता है और नदी की कार्यशैली खतरे में आ जाती है. केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, सभी मौजूदा पनबिजली परियोजनाओं में नियंत्रित जलमार्ग के माध्यम से अनिवार्य पर्यावरण-प्रवाह जारी करने का प्रावधान है. हालांकि, गंगा नदी प्रणाली से नहरों के प्रवाह के आबंटन के मद्देनजर सिंचाई व्यवस्था में सुधार और नहरों की दक्षता में सुधार के माध्यम से अतिरिक्त प्रवाह को बढ़ाया जाना चाहिए. सिंचाई क्षमता में सुधार होने के बाद पुराने बांधों को विघटित किया जाना चाहिए.

10. पानी के मूल्य निर्धारण के माध्यम से जल और अपशिष्ट जल संरचना के संचालन और रखरखाव (O & M) के लिए पर्याप्त राजस्व उत्पन्न करने के लिए नए तकनीकी तरीके विकसित करना. वित्त की कमी के कारण नगरपालिका अपने मौजूदा एसटीपी को संचालित करने के लिए संघर्ष कर रही है. नगरपालिका और शहरी स्थानीय निकाय संचालन और रखरखाव विभाग को वित्त देने के लिए बांड बाजारों में टैप कर सकते हैं.


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गंगा संरक्षण आवश्यक, फिर गंगा बेसिन की सहायकों, जलाशयों, भूगर्भीय जल स्त्रोतों की अनदेखी क्यों?

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भारत की आधी से अधिक जनसंख्या का पालन पोषण एक मां के समान करती है गंगा. प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष..हर देशवासी कहीं न कहीं इसी गंगत्त्व से जु...
गंगा नदी - हिमालय और गंगा जैसे प्राकृतिक संसाधनों का महत्त्व समझें (MMITGM : 39 व 40)

गंगा नदी - हिमालय और गंगा जैसे प्राकृतिक संसाधनों का महत्त्व समझें (MMITGM : 39 व 40)

MMITGM : (39) हे प्रचंड-आवेगों की विभिन्नता के शक्ति-तरंगों को अपने हृदयस्थ करने वाले हिमालयन-शिवलिंगाकार भोलेनाथ! आपने आकाश-मार्ग, पाताल-मा...
गंगा नदी - प्राकृतिक संपदा के संरक्षण के लिए हिमालय का संरक्षण होना आवश्यक है (MMITGM : 36 व 37)

गंगा नदी - प्राकृतिक संपदा के संरक्षण के लिए हिमालय का संरक्षण होना आवश्यक है (MMITGM : 36 व 37)

MMITGM : (36)हिमालयन-शिवलिंग के बदलते स्वरूप से, इसकी न्यून होते शक्ति-संतुलन से, तीव्र होता विश्व की आर्थिक सम्पदा विघटन और प्रचंड होती विश...
गंगा नदी - गंगा नदी संरक्षण का दससूत्रीय कार्यक्रम

गंगा नदी - गंगा नदी संरक्षण का दससूत्रीय कार्यक्रम

हिमालय तीन प्रमुख भारतीय नदियों का स्रोत है, यानि सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र. लगभग 2,525 किलोमीटर (किमी) तक बहने वाली गंगा भारत की सबसे लंबी...
गंगा नदी - गंगा और मानव-शरीर में जीवन्त समरूपता, गंगा और मानव-शरीर पर स्थान और समय के प्रभाव में समरूपता : अध्याय-3 (3.7)

गंगा नदी - गंगा और मानव-शरीर में जीवन्त समरूपता, गंगा और मानव-शरीर पर स्थान और समय के प्रभाव में समरूपता : अध्याय-3 (3.7)

जिस तरह विभिन्न क्षेत्रों, प्रांतों व देशों के लोग, विभिन्न शारीरिक एवं चारित्रिक गुणों के होते हैं, उसी तरह विभिन्न क्षेत्रों एवं देशों की ...
गंगा नदी - हिमालय पृथ्वी के वातावरण और जलवायु को निर्धारित करता है, यह वातावरण का कंट्रोलिंग पॉवर हाउस है. MMITGM : (34 व 35)

गंगा नदी - हिमालय पृथ्वी के वातावरण और जलवायु को निर्धारित करता है, यह वातावरण का कंट्रोलिंग पॉवर हाउस है. MMITGM : (34 व 35)

केन्द्रस्थ : Catching hold of Nucleus : MMITGM : (34) हिमालयन शिवलिंग भारत सहित समस्त पृथ्वी के वातावरण और जलवायु के पर्वतीय पावर मोनीटरिंग ...
गंगा नदी - एनजीसी की बैठक में लिया गया निर्णय – गंगा की सहायक नदियाँ भी की जाएंगी प्रदूषण मुक्त

गंगा नदी - एनजीसी की बैठक में लिया गया निर्णय – गंगा की सहायक नदियाँ भी की जाएंगी प्रदूषण मुक्त

नेशनल गंगा काउंसिल की प्रथम बैठक में प्रधानमंत्री माननीय मोदी ने कहा कि जिस प्रकार गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करने के प्रयास किए जा रहें हैं,...
गंगा नदी - गंगा और मानव-शरीर पर समय एवं स्थान के प्रभाव में समानता, अध्याय-3

गंगा नदी - गंगा और मानव-शरीर पर समय एवं स्थान के प्रभाव में समानता, अध्याय-3

बरसात के बाद गंगा का जल-स्तर, मिट्टी का आयतन, ऑक्सीजन की मात्रा, ऊर्जा तथा शरीर का आकार घटने लगता है. ऐसी स्थिति में भूमिगत जल जो बरसात में ...
गंगा नदी - पहाड़, शिव का जीवन्त-शरीर है (MMITGM : (31 व 32)

गंगा नदी - पहाड़, शिव का जीवन्त-शरीर है (MMITGM : (31 व 32)

कण-कण में, हर एक एटम में, एलेक्ट्रोन और प्रोटोन के बराबरी रूप से विराजमान न्यूट्रॉन, ब्रह्मांड को आच्छादित करने वाले, भगवान शिव से-हे भोलेना...
गंगा नदी - पहाड़ों और नदियों के संबंध को समझने के लिए जानना होगा पौराणिक-धार्मिक धाराओं को : MMITGM : (29 व 30)

गंगा नदी - पहाड़ों और नदियों के संबंध को समझने के लिए जानना होगा पौराणिक-धार्मिक धाराओं को : MMITGM : (29 व 30)

MMITGM : (29), पहाड़ शिवलिंग हैं - भगवान शिव से-हे भोलेनाथ! पहाड़ रूप महान स्थिर और केन्द्रस्थ, आप का शिवलिंग जड़ पाताल में कहाँ है पता नहीं. च...
गंगा नदी - नदियों का चारित्रिक गुण समझना होगा, गंगत्त्व में ही छिपा है हिंदुत्व (MMITGM : 27 व 28)

गंगा नदी - नदियों का चारित्रिक गुण समझना होगा, गंगत्त्व में ही छिपा है हिंदुत्व (MMITGM : 27 व 28)

MMITGM : (27) भगवान शिव से-हे भोलेनाथ! विश्व भर में पर्वतों के विभिन्न स्वरूपों को धारण करने वाले आप हैं. जैसे मानव शरीर में हृदय रक्त मस्ति...
गंगा नदी - गंगा और मानव-शरीर में जीवन्त समरूपता : MMITGM (31)

गंगा नदी - गंगा और मानव-शरीर में जीवन्त समरूपता : MMITGM (31)

मानव युवा-अवस्था में प्रदूषित भोजन, जल एवं वायु को बहुत हद तक अपने शरीर में व्यवस्थित करने का सामर्थ्य रखता है. उसी तरह गंगा की शक्ति बरसात ...
गंगा नदी - आणविक सिद्धांत का प्रदिपादन : MMITGM : (24 व 25)

गंगा नदी - आणविक सिद्धांत का प्रदिपादन : MMITGM : (24 व 25)

भगवान शिव से- हे भोलेनाथ! आज भगवान श्रीकृष्ण के कथन, "अच्छेद्योअ्यमदाह्येअ्यमक्लेद्योअ्शोष्य एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोअ्यं सनातनः"।। (...

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